Friday, 4 January 2019

जयपुर की सैर: भाग 3...


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2.  जयपुर की सैर: भाग 2...
3.  जयपुर की सैर: भाग 3...
4. जयपुर की सैर: भाग 4... 

अगले दिन सुबह 6 बजे ही मेरी आँख खुल गयी। मैं चाय ले कर खिड़की के पास बैठ गया और सड़क पर दौड़ती गाड़ियों को देखता रहा। जयपुर एयरपोर्ट बिलकुल पास था। सुबह सुबह विमानों की आवाजाही शुरू हो गयी थी। हवाई जहाज टेक ऑफ कर बाएं या दांये मुड़ जाते। चाय ख़त्म हुई तो मैं भी तैयार होने लगा। आज मुझे एक कांफ्रेंस के लिए निकलना था जहाँ मुझे दोपहर तक काम था । तब तक बाक़ी तीनों लोग होटल में ही रुकने वाले थे। 


हम लोग होटल के रेस्टोरेंट में ब्रेकफास्ट के लिए पहुंचे। वही रूटीन वाला होटल buffet ब्रेकफास्ट था। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भूपेंदर हुड्डा भी यहीं नाश्ता कर रहे थे। शायद अपनी पार्टी की किसी चुनावी सभा के लिए आये होंगे। नाश्ते के बाद मैं अपने काम पर निकल गया। 

दोपहर में वापस होटल पहुंचा। तीनों लोग तैयार हो मेरा ही इंतजार कर रहे थे। हम लोग तुरंत ही घूमने निकल पड़े। पहले लंच करना था। लेकिन आज हम किसी रेस्टोरेंट में नहीं जाने वाले थे। कल दोनों टाइम रेस्टोरेंट में पनीर खा कर बच्चे भी ऊब गए थे। 

सबसे पहले राजस्थान हाई कोर्ट गए जो कि स्टेचू सर्किल के बिलकुल पास है। हाई कोर्ट के साथ वाली सड़क पर SBBJ (जो कि अब SBI हो गया है) बैंक की मुख्य शाखा के सामने कलकत्ती चाट भंडार पहुंचे। यह चाट भंडार अपने चीले और दही बड़े के लिए बहुत प्रसिद्द है। सड़क के किनारे दो रेहड़ियों पर बढ़िया मूंग दाल का चीला और दही बड़े बनाये जाते हैं। चीले के साथ लहसुन की तीखी चटनी, खजूर की मीठी चटनी, हरे धनिये की चटनी, उबले चनों की मसालेदार चाट, दही और इन सब को मिलाकर बनाया गया रायता दिया जाता है। दही बड़े में मूंग दाल के बड़े और दही के साथ यही सब चटनियाँ सर्व की जाती हैं। इन्होने बैठने के लिए सड़क के किनारे कुछ छोटे छोटे स्टूल और एक लकड़ी का फट्टा लगा कर एक टेबल भी बना दिया है। आसपास इतने कार्यालय वगैरह हैं कि लंच टाइम में बैठने के लिए जगह नहीं मिलती और लोग खड़े खड़े भी खाते हैं। 

हमने एक प्लेट चीला और एक दही बड़े का आर्डर कर दिया। बड़े से भारी तवे पर चीले को सिकते हुए देखना भी अपने आप में एक अनुभव है। कुछ महीने पहले मैं अपने बॉस, उमेश लालजानी, के साथ जयपुर टूर पर था। दोपहर को लंच के लिए यहाँ पहुंचे। हम लोग भी चीले को सिकता देखने का अनुभव ले रहे थे। बनाने वाले ने चीले का घोल तवे पर डाला। एक तरफ सिकने के बाद जैसे ही चीले को पलटा, तेल के ढेर सारे छींटे मेरे बॉस की सफ़ेद शर्ट पर चित्रकारी कर गए। यानि चीला सिकता देखना भी हो तो दूर से ही देखा जाये। 

हम लोग आर्डर दे कर स्टूल्स पर बैठ गए। मेरे अलावा बाकी तीनों को थोड़ा असहज महसूस हो रहा था कि पता नहीं खाना कैसा होगा। पहले चीला आया। हमेशा की तरह चीला बहुत ही स्वादिष्ट थे। बच्चा पार्टी ने खजूर की चटनी, चने और दही के साथ खाया और तीखी चटनियाँ बड़ों के लिए छोड़ दी गयीं। चीला अभी आधा ही ख़त्म हुआ था कि दही बड़े की प्लेट भी आ गयी। चीले के तीखे स्वाद को दही बड़ा बढ़िया से संतुलित कर रहा था। हालाँकि इस में भी थोड़ी से लहसुन चटनी डाली हुई थी। लेकिन बच्चे अब चीला छोड़ कर दही बड़ा ही खा रहे थे। हमने चीला ख़त्म किया और दही बड़े की तरफ ध्यान दिया। बच्चों ने दही बड़े में से दही पहले खा लिया था और बड़ा छोड़ दिया था । तभी चाट भण्डार वाले भाई बिना कहे एक बड़ा चमचा भर दही लाये और हमारी प्लेट में परोस गए। यानि वो पीछे बैठे ग्राहकों का भी पूरा ध्यान रख रहे थे। 

वाह !! राजस्थान की आवभगत का पूरा पूरा परिचय। 

दही बड़ा भी बहुत बढ़िया था। खाना ख़त्म कर मैंने बच्चों को पूछा कि कौन सी डिश दोबारा ली जाये। तीनों ने ही पेट और मन, दोनों ही भरने की घोषणा कर दी। इसके बाद बिल देने की बारी आयी। बिल था सिर्फ 160 रुपये। दोनों ही डिशेज़ 80 रुपये की थीं। खाने की मात्रा इतनी है कि एक व्यक्ति के लिए एक डिश पर्याप्त है। और हमने तो दो डिशेज़ में पौने तीन लोगों ने खा लिया। 

आज का रोडसाइड लंच बहुत बढ़िया था और सबको ही बहुत पसंद आया। पास ही एक चाय की थड़ी थी। थड़ी यानि बैठक वाली दुकान, जहां बैठो, चाय पियो और गपशप करते रहो। दुकान के बाहर बहुत से स्टूल रखे थे, जो साइकिल के पहिये के रिम से बने थे। राजस्थान में ऐसे दुकानों के बाहर ये स्टूल बहुत मिलते हैं। हम भी यहीं बैठ गए और चाय के लिए बोल दिया। तीखी चटनियों के स्वाद के बाद इलाइची वाली गरम मीठी चाय पीने में मजा ही आ गया। चाय ख़त्म की और कल के अधूरे कार्य को पूरा करने चल दिए। यानि अल्बर्ट हॉल देखने। 

यहाँ से ई-रिक्शा किया और अल्बर्ट हॉल म्यूजियम पहुँच गए। ये वाले चालक भी अपने वाहन को उलटी दिशा से ही ले कर गए। शायद ई-रिक्शा वालों को चालान का कोई डर नहीं था। म्यूजियम के गेट पर उतरे और टिकट खिड़की पर पहुँच गए। दिन में टिकट सिर्फ 100 रुपये में मिल गए जो कि कल शाम 300 रुपये में मिल रहे थे। कल के पूरे विवरण के लिए यहाँ क्लिक करें। 

सिक्योरिटी चेक के बाद म्यूजियम के अंदर पहुंचे। म्यूजियम में पुराने समय की बहुत सी वस्तुएं प्रदर्शित की गयीं थीं। इनमे पोशाकें, गहने, अस्त्र-शस्त्र, साज-सज्जा की वस्तुएं, वाद्य यंत्र, हाथी दांत की वस्तुएं, पुराने बर्तन व और भी बहुत सी चीजे थीं। म्यूजियम में देखने के लिए इतना सब है कि तसल्ली से देखने के लिए कम से कम 2 घंटे का समय लगे। म्यूजियम के बेसमेंट में एक ममी भी प्रदर्शित की गयी है। सभी जगह जानकारी के लिए बहुत से सूचना पत्र भी लगे हैं। 

हमें म्यूजियम देखने में 1 घंटे से ज्यादा समय लगा। म्यूजियम का आखिरी भाग देख बाहर निकलने लगे तो देखा कि कुछ लोग कठपुतली का नाच दिखा रहे थे। ये लोग लगातार राजस्थान के लोक गीत भी गा रहे थे, जिसकी आवाज हमें पूरे म्यूजियम में सुनाई दे रही थी। राजस्थान के लगभग हर महल, म्यूजियम या किसी अन्य पर्यटक स्थल पर इस तरह के लोक गीत गाने वाले जरूर मिलते हैं। 

बच्चों ने पहली बार कठपुतली का नाच देखा, जो कि उन्हें पसंद भी आया । यहाँ से बाहर आ कर हम थोड़ी देर के लिए लॉन में बैठ गए। काफी देर चलने के बाद ये ब्रेक बढ़िया रहा। 

इसके बाद फिर ई-रिक्शा किया और हवामहल के लिए चल दिए। साथ साथ रिक्शे वाले से बात भी शुरू हो गयी। 

"जो वहाँ जा ही रहया हो तो बाहर सूं ही देख लीजो।"
"क्यों, ऐसे क्यों कह रहे हैं?"
"भीतर कुछ है ही कोनी !! बस पैड़ियाँ चढ़या जाओ और वापस नीचा नै उतर आओ।"
"तो फिर क्या करें?"
"मेरी बात मानो तो सामना सूं ही देख लो। वरना बगैर बात के पीसा बिगड़ेंगा।"

खैर ! हम लोग हवामहल पहुंचे। अंदर टिकट घर जा कर टिकट लिया। कुल 105 रुपये लगे। बड़ों का टिकट 50 रूपये। बेटे का 5 रुपये और बेटी का स्टॉफ। 

अंदर जा कर देखा तो वाकई कुछ ऐसा था ही नहीं। जे पी दत्ता की फिल्म में दिखाई किसी पुरानी राजस्थानी हवेली जैसा ही था। मानो अभी विनोद खन्ना जी दोनाली बन्दूक लिए आ जायेंगे !! 

सीढ़ियां और रैंप से चढ़ते चढ़ते हम टॉप फ्लोर तक पहुंचे। बीच में हर फ्लोर पर फोटो खींचते और झरोखों से बाहर सड़क को देखते। आखरी सीढ़ियां बिलकुल पतली और सीधे थीं। इसको चढ़ते और उतारते हुए बच्चे घबरा ही गए। 

लेकिन बिलकुल ऊपर पहुँच जयपुर का बढ़िया व्यू मिला। मुख्यतः तो जंतर मंतर और दूर नाहरगगढ़ के किले की दीवारें ही दिखी। थोड़ा समय वहां रुक वापस नीचे उतरने लगे। ग्राउंड फ्लोर तक पहुंचे। सवाई प्रताप सिंह जी का स्टेचू देखा। बाहर निकल थोड़ी देर बेंच पर बैठे कि सामने लगा फव्वारा शुरू हो गया। इस से माहौल थोड़ा बेहतर हो गया। हमने भी मोबाइल के कैमरे से स्लो-मो और टाइम लैप्स फंक्शन के साथ कई वीडियो बनाये। ख़ास तौर पर स्लो-मो में फव्वारे के पानी का गिरना बहुत अच्छा लगा। 

थोड़ी देर बाद हम लोग यहाँ से वापस चल पड़े। कुल मिला कर टॉप फ्लोर से दिखे व्यू, महाराजा प्रताप सिंह जी के स्टेचू और फाइनली इस फव्वारे के वीडियो से हमारे 105 रुपये वसूल हो ही गए थे। और हाँ, यहाँ भी एक लोक गायकों की मण्डली बढ़िया राजस्थानी गाने गा रही थी। जिन्होंने हमारी बिटिया के आग्रह पर जे पी दत्ता जी की फिल्म बँटवारा का "थारे वास्ते रे ढोला" गाना भी सुनाया। 

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चीला  



दही बड़ा 




अल्बर्ट हॉल म्यूजियम  
























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